मावस री बेला आई

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

मावस री बेला आई,

मावस री बेला आई,

ओ देखो....सज गया माँ का द्वार,

मावस री बेला आई,

चालो जी झुंझुनू चालो,

मावस मेले में चालो,

ओ मेले का है दर्श अपार,

मावस री बेला आई,

याकि महिमा अपरम्पार,

मावस री बेला आई।

माँ बापू ने थे ले लो,

टाबर ने सागे ले लो,

लुगाई सागे जोड़े री जात,

मावस री बेला आई,

ओ देखो सज गया माँ का द्वार,

मावस री बेला आई।

रोली मौली और मेहंदी

सागे चिटकी भी लेलो,

ओ चुड़ा चुनार लेलो साथ,

मावस री बेला आई,

ओ देखो सज गया माँ का द्वार,

मावस री बेला आई।

या मेलो लागे भारी,

दुनियाँ देखण आवे भारी,

चालो चालो माँ के द्वार,

मावस री बेला आई,

ओ देखो सज गया माँ का द्वार,

मावस री बेला आई।

म्हारी मावस को है चर्चो,

घर घर में याको पर्चों,

अपर्णा मन में आई चाव,

मावस री बेला आई,

ओ देखो सज गया माँ का द्वार,

मावस री बेला आई।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।