वाह गुरु

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॥ पावन पाठ ॥

की वडियाईयाँ तेरियां, मेरे सतगुरु जी ओ,

की वडियाईयाँ तेरियां, मेरे सतगुरु जी ओ,

पीरा दा महापीर तू हैं,

फ़क़रा अव्वल फ़कीर तू है,

हाँसा वी तू, नीर तू है,

रूह दा असल शरीर तू है,

सब बहणा दा वीर तू है,

शुरू वी तू आखिर तू है,

वाहे गुरु, वाह गुरु, वाह वाह गुरु,

वाह वाह गुरु, वाह वाह गुरु,

रुक्ख वी तेरे पत्ते तेरे,

महल ए सारे ही छत्ते तेरे....-2

फ़िक्के तेरे रत्ते तेरे,

रंग ए सारे कत्ते तेरे,

तू कण कण विच,

कण कण तेरा,

सत् ही सुर ने, सत् ने तेरे,

वाह वाह गुरु, वाह वाह गुरु,

वाह वाह गुरु, वाह वाह गुरु।

हर तन नूं वस्त्र बाणे देंदा,

भुल्ल सबना दी जाणे देंदा....-2

की गांवा तेरी महिमा सतगुरु,

हरेक चुंज नूं दाणे देंदा,

पक्के तेरे, कच्चे तेरे,

झूठे तेरे, सच्चे तेरे,

सानूं पार लंघा दो सतगुरु,

अस्सी अनजान बच्चे तेरे,

वाह वाह गुरु, वाह वाह गुरु,

वाह वाह गुरु, वाह वाह गुरु।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।