मेथों मंगो ना गुनाहां दा हिसाब

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॥ पावन पाठ ॥

मेथों मंगो ना गुनाहां दा, हिसाब गुरुजी।

दस्सो केड़े मुंओ देवां मैं, जवाब गुरुजी।

बन्द कर देओ मेरी ऐ, किताब गुरुजी,

दस्सो केड़े मुंओ, देवां मैं, जवाब गुरुजी।

मेथों मंगो ना गुनाहां दा......

वेख लोकां दियां खुशीयां मैं, जलदा रया।

दीवा ईर्षा दा दिल विच्च, बलदा रया।

सदा रही मेरी नीयत खराब, गुरुजी।

दस्सो केड़े मुंओ देवां मैं, जवाब गुरुजी।

मेथों मंगो ना गुनाहां दा......

किसे दुखिये दा दर्द मैं, वंडाया ही नईं।

ओदे ज़ख़्मां ते मल्लम, लगाया ही नहीं।

रया बन के मेँ खुद च, नवाब गुरुजी,

दस्सो केड़े मुंओ, देवां मैं, जवाब गुरुजी।

मेथों मंगो ना गुनाहां दा......

दास बणदा स्याणां है नादान, गुरुजी।

तुआथों लुकया नईं कुछ जाणीजाण, गुरुजी।

लख ओढ़ लां मैं चेहरे ते नकाब, गुरुजी।

दस्सो - केड़े मुंओ, देवां मैं, जवाब गुरुजी।

मेथों मंगो ना गुनाहां दा......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।