साई दे आशिक़

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

साई देया आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए...

हथ विच पाउँदा छल्ला गाल विच जानी ए.... -2

जीन दा सलीका असी साई कोलो सिख्या

कल्ला ओह फ़क़ीर जिहने दुनिया नू जीत्या -2

हाथ विच कासा ओहदे रूह भी नूरानी ए

एत्थे ओहदे आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए

साई देया आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए...

दिला विच रेह्न्दा जेहड़ा जग दा ओ जानी ए

करदा ओह साडे उत्ते सदा मेहरबानी ए -2

जोगी भी दीवाने ओहदे दुनिया दीवानी ए

एत्थे ओहदे आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए

साई देया आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए...

भूले वांगु जचना ते भुल्ले वांगु नचना

साई नू मनोना इहना सोखा नहिओ सज्जना -2

गेरहा दी कलम नाले ओमी दी जुबानी ए

एत्थे ओहदे आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए

साई देया आशिक़ा दी एहो ही निशानी ए...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।