धरा पर अँधेरा बहुत छा रहा है

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॥ पावन पाठ ॥

धरा पर अँधेरा बहुत छा रहा है।

दिये से दिये को जलाना पड़ेगा॥

घना हो गया अब घरों में अँधेरा।

बढ़ा जा रहा मन्दिरों में अँधेरा॥

नहीं हाथ को हाथ अब सूझ पाता।

हमें पंथ को जगमगाना, पड़ेगा॥

दिये से दिये को जलाना पड़ेगा॥

विषम विषधरों सी बढ़ी रूढ़ियाँ हैं।

जकड़ अब गयीं मानवी पीढ़ियाँ हैं॥

खुमारी बहुत छा रही है नयन में।

नये रक्त को अब जगाना पड़ेगा॥

दिये से दिये को जलाना पड़ेगा॥

करें कुछ जतन स्वच्छ दिखें दिशायें।

भ्रमित फिर किसी को करें ना निशायें॥

अँधेरा निरकुंश हुआ जा रहा है।

हमें दम्भ उसका मिटाना पड़ेगा॥

दिये से दिये को जलाना पड़ेगा॥

हमें लोभ है इस कदर आज घेरे।

विवाहों में हम बन गए हैं लुटेरे॥

प्रलोभन यहाँ अब बहुत बढ़ गए हैं।

हमें उनमें अंकुश लगाना पड़ेगा॥

दिये से दिये को जलाना पड़ेगा॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।