राजदुलारी

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

तू महलों में रहने वाली

मैं जोगी जट्टा धारी हूं

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूं -2

पर्वत पे मैं करू गुजारा

मेरा कोई घर वार नहीं

व्याह कराके मेरे संभले

सांस ससुर का प्यार नहीं

तू सेजो पे सोने वाली आ

खटिया पलग निवास नहीं

तू मांगेगी कहाँ से दूंगा

सीसा हार सिंगार नहीं

तुझे 56 भोज की आदत है

मैं बिलकुल पेट पुजारी हूं

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूं....

तेरे प्यार में होई मैं दीवानी

अरे शम्भू

तेरे प्यार में होई मैं दीवानी...-4

ब्रह्मा से तू व्याह कराले

ब्राह्मणी बन जावेगी

इंद्र से तू व्याह करवाले

इंद्र रानी बन जावेगी

विष्णु से तू व्याह कराले

पटरानी बन जावेगी

मेरे संग में व्याह की हट से

तेरी हानी बन जाओगी

तू राजा हिमाचल की लड़की

मैं समशान बिहारी हूं

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूं

तू महलों में रहने वाली

मैं जोगी जट्टा धारी हूं

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूं...

तू सोनी मैं सुंदर ना हूँ

पिता घोट के भंगा हूँ

जटा झूट भी काली कूट भी

मस्ती मैं मस्त मलंगा हूँ

रोज लड़ेगी तेरी सौतन

रखता शीश पे गंगा हूँ

देख देख तेरा दम निकलेगा

लिपटा है कई भुजंगा हूँ

ना खाने को ना पिने को

नाम का शिव भंडारी हूँ

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूँ

तू महलो में रेहन वाली

मैं जोगी जटा धारी हूँ

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूँ

महादेव शिव साई महेश्वर शम्भू

हर हर हर शिव साई शंकर शम्भू

सत साई शंकर शम्भू

रास नहीं रंग रास नहीं

कैसे मन बहेलालेगी

ठंडी बर्फ पे सोना होगा

सर्दी मैं तू डर जाएगी

हाँथ पे पड़ जायेंगे छाले

भांग का घोटा लावेगी

मेरे पास कोई नहीं सवारी

तू पीहर कैसे जावेगी

तेरे मन का कमल खिलेना

अर्ध पुरुष अर्ध नारी हूँ

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता अटल अटारी हूँ

तू महलो में रेहन वाली

मैं जोगी जटा धारी हूँ

तेरा मेरा मेल मिले ना

रहता मस्त मलंगा हूँ

तेरे प्यार में होई मैं दीवानी अरे शम्भू

तेरे प्यार में होई मैं दीवानी

तेरे प्यार में होई मैं दीवानी अरे शम्भू

तेरे प्यार में होई मैं दीवानी

मैं चुप होकर भी हर बात हु

मैं दिन होकर भी अँधेरी रात हु

तू चिंता मत कर मेरी गौरा

मैं दूर होकर भी तेरे साथ हु

मैं दूर होकर भी तेरे साथ हु

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।