चिरमी म्हारीं चिरमली चिरमी रा डाला चार

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॥ पावन पाठ ॥

चिरमी म्हारीं चिरमली चिरमी रा डाला चार,

भोळी म्हारी चिरमी रे

चिरमी बाबो सा री लाडली,

चिरमी बाबो सा री लाडली,

बा तो मोत्यां बिचली लाल

वारी जाऊँ चिरमी ने।।

चिरमी माऊंसा री लाडली।

चिरमी मांऊसा री लाडली।

बा तो काळजिये री कोर.

भोळी म्हारी चिरमी रे।।

ऊंचले डाले म्हे चढ़ा,

म्हारे निचले डाळे जेठ,

वारी जाऊं चिरमी रे

म्हारे निचले डाळे जेठ

वारी जाऊं चिरमी रे।।

उतरो जेठ जी म्हें चढ़ा,

उतरो जेठ जी म्हे चढ़ा

कोई जोऊँ म्हारें बाबोसा री बाट,

भोळी म्हारी चिरमी रे।।

चढ़ती ने दिखे मेड़तों,

चढ़ती ने दिखे मेड़तो,

उतरती ने,

उतरती ने दिखे अजमेर,

वारी जाऊँ चिरमी ने,

उतरती ने दिखे अजमेर,

वारी जाऊँ चिरमी ने।।

चढ़ती रो चमके चुड़लो,

चढती रो चमके चुड़लो,

उतरती रो नौसर हार,

भोळी म्हारी चिरमी रे।।

बाबोसा रे चढ़वा घोड़लों,

बाबोसा रे चढ़बा घोड़लो,

म्हारे बीरो सा रे,

म्हारें बीरो सा रे चढ़वा टौड़,

भोळी म्हारी चिरमी रे

घुड़ले रे बांधण घुघरा,

घुड़ले रे बांधण घुघरा,

कोई टोरड बांधण लूम,

वारी जाऊं चिरमी ने,

चिरमी म्हारीं, चिरमली,

चिरमी रा डाला चार,

भोळी म्हारी चिरमी रे

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।