बलम संग सोय गई दोउ जनी

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

दोउ जनी हा दोउ जनी

बलम संग सोय गई दोउ जनी

दोउ जनी हा दोउ जनी

बलम संग सोय गई दोउ जनी

दोउ जनी ,

बलम संग सोय गई दोउ जनी ,

एक ब्याही एक अरधी कहावे

दोनों सुगम सुहाग भरी,

बलम संग सोय गई दोनो जनी ,

दोउ जनी हा दोउ जनी

बलम संग सोय गई दोउ जनी,

ब्याही तो उजियार दिखावे,

अरधी लय अधियार खड़ी,

सजन संग सोय गयी दोउ जनी

दोउ जनी हा दोउ जनी

बलम संग सोय गई दोउ जनी,

ब्याही तो सुख निदिया सोवावय,

अरधी दुःख सुख माथे धरी

बलम संग सोय गई दोउ जनी

दोउ जनी हा दोउ जनी

बलम संग सोय गई दोउ जनी,

कहत कबीर सुनो भाई साधु ,

दोनों पिया पियार रहीं ,

बलम संग सोय गई दोउ जनी

दोउ जनी हा दोउ जनी ,

बलम संग सोय गई दोउ जनी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।