दरशण देता जईज्यो जी

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

सतगुरु मिलता जईज्यो जी

दरशण देता जईज्यो जी,

सतगुरु मिलता जईज्यो जी,

म्हारें पिवरीये री बाता थोड़ी,

म्हानें कहता जईज्यो जी।

सोने जेड़ी पीली पड़ गई,

दुनियाँ बतावै रोग,

रोग दोष म्हारे कोई नहीं लागे,

गुरू मीलण रो जोग,

दरशण देता जईज्यो जी,

सतगुरु मिलता जईज्यो जी,

म्हारें पिवरीये री बाता थोड़ी,

म्हानें कहता जईज्यो जी।

म्हारें बाबे म्हानें बींद बतायों,

पकड़ बताई बाँह,

कोय को मैं कोई ना समझूँ,

कोय को मैं कोई ना समझूँ,

जीव भजन रै माय,

दरशण देता जईज्यो जी,

सतगुरु मिलता जईज्यो जी,

म्हारें पिवरीये री बाता थोड़ी,

म्हानें कहता जईज्यो जी।

म्हारे देश रा लोग भला है,

पहरे कंठी माळा,

म्हारा लागे वे भाई भतीजा,

म्हारां लागे वे भाई भतीजा,

राणा जी रा साळा,

दरशण देता जईजो जी,

सतगुरु मिलता जईजो जी,

म्हारें पिवरीये री बाता थोड़ी,

म्हानें कहता जईज्यो जी।

सासरीयो संसार छोड़ियो,

पीव ही लागे प्यारो,

बाई रे मीरा ने गीरधर मिलियों,

बाई रे मीरा ने गीरधर मिलियों,

चरण कमल लीपटायो,

दरशण देता जईजो जी,

सतगुरु मिलता जईजो जी,

म्हारें पिवरीये री बाता थोड़ी,

म्हानें कहता जईज्यो जी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।