बोले मन की तरंग रहे सदा सुहागन

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॥ पावन पाठ ॥

पर्व वट सावित्री का मनाये उम्र स्वामी की लम्भी कर आये

सवित्री माँ को ध्याये गे हर दम

बोले मन की तरंग रहे सदा सुहागन

वट वृक्ष की परिक्रमा हम लगाये,

बाँध के लाल धागा दिए हम जलाए

करके जय अर्पण हम करे पूजन

जब तक हो अपनी सांसो में ये दम

बोले मन की तरंग रहे सदा सुहागन

करे तेरी पूजा और कहे दिल मेरा

खुशियों में अपने छाए कभी न अँधेरा

करू ये कामना सब सुखी हॉवे माँ

कभी छु भी न पाए कोई गम

बोले मन की तरंग रहे सदा सुहागन

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।