प्रभु वाल्मीकि जी दुनिया दे वाली ऐ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

प्रभु वाल्मीकि जी दुनिया दे वाली ऐ

बनाते है बिगड़ी दर आये जो सवाली है

प्रभु नाम वाला रंग जिहनू चढ़ जांदा है

नाम सिमर दा जो भी भव तर जांदा ऐ,

सिर हथ रखके करिए मेहर देया वाली ऐ

प्रभु वाल्मीकि जी दुनिया दे वाली ऐ

चरना च बह के तेरे अर्ज गुजारा मैं,

दिलो याद करके बाबा तेनु पुकारा मैं

रुल ना जावा किते मैं आप सवाली ऐ

प्रभु वाल्मीकि जी दुनिया दे वाली ऐ

सुबह शाम बाबा तेरा सिमरन कर दे ने

गुरु महराज सब दिया झोलिया भर दे ने

सेवा च लाये आशीष नु कर नजर दया वाली ऐ

प्रभु वाल्मीकि जी दुनिया दे वाली ऐ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।