साँसों का इक तारा बोले जय माता दी

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

साँसों का इक तारा बोले जय माता दी

मस्ती में जग सारा बोले जय माता दी

सूरज चंदा लाखो तारे द्वार तुम्हारे झुकते सारे

हर कोई जैकारा बोले जय माता की जय माता की

साँसों का इक तारा बोले जय माता दी

सोये भाग जगाने वाली बिगड़ी बात बनाने वाली

सूखे फूल खिलाने वाली माँ आंबे

ठंडी शीत गुफाओं वाली दया से भरी निगाहो वाली

अद्भुत आठ बुजाओ वाली माँ आंबे

ज्योति का उजियारा बोले जय माता की जय माता की

साँसों का इक तारा बोले जय माता दी

अकबर जिसके द्वार पे आया और सोने का छतर चडाया

महा दयालु है महामाया माँ आंबे

भगत जनों को तारने वाली दुष्ट जनों को मारने वाली बिगड़े काज सवारने वाली माँ आंबे

गंगा की रस धारा बोले जय माता की जय माता की

साँसों का इक तारा बोले जय माता दी

जिसकी धरती जिसका अम्बर जिसकी रचना सात समन्दर

वसी हु कण कण के अन्दर माँ आंबे

जिसकी है ये धुप और छाया जिसने ये भ्र्मांड रचाया मौज में आके पलटे काया माँ आंबे

भगती का बंजारा बोले जय माता की जय माता की

साँसों का इक तारा बोले जय माता दी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।