तेरे होते क्यों दादी मैं हार जाती हु

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

हार बार मैं खुद को लाचार पाती हु

तेरे होते क्यों दादी मैं हार जाती हु

हर कदम क्या युही मैं ठोकर खाऊ गी

माँ इतना केह दे क्या मैं जीत न पाउंगी

तेरी चोकठ पे मैं क्या बेकार आती हु

तेरे होते क्यों दादी मैं हार जाती हु

तू अपनी बेटी को तू भूली बिसरी है

लाडो अरदास लिए चोकठ पे पसरी है

तेरी ममता याद दिलाने तेरे द्वार आती हु

तेरे होते क्यों दादी मैं हार जाती हु

मेरे हाथ पकड़ ले माँ मैं इतना ही चाहू

स्वाति फिर जीवन में मैं हार न पाऊ

अरमान ये हर्ष लिए दरबार आती हु

तेरे होते क्यों दादी मैं हार जाती हु

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।