क्यूँ पानी मे मल मल नहाये

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

क्यूँ पानी मे मल मल नहाये,

मन की मैल उतार दो प्यारे ,

मन की मैल उतार ,

क्यूँ पानी मे मल मल नहाये,

मन की मैल उतार दो प्यारे,

मन की मैल उतार

पाप कर्म छोड़े नहीं तन से कैसे होये उद्धार

पाप कर्म छोड़े नहीं तन से कैसे होये सुधार

क्यूँ पानी मे मल मल नहाये,

मन की मैल उतार दो प्यारे

मन की मैल उतार

हाड मॉस की देह बानी है

भरे सदा नख द्वार

क्यूँ पानी मे मल मल नहाये,

मन की मैल उतार दो प्यारे

मन की मैल उतार

सत्संग तपती रस जल निर्मल

नित उठ गोटा मार ओ प्यारे

क्यूँ पानी मे मल मल नहाये,

मन की मैल उतार दो प्यारे

मन की मैल उतार

ब्रह्मा नन्द भजन भज हरी का

ब्रह्मा नन्द भजन कर हरी का

जो चाहे निस्तार

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।