माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे

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॥ पावन पाठ ॥

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे,

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूगी तोहे ।

आये हैं तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर,

एक सिंघासन चडी चले, एक बंदे जंजीर ।

दुर्बल को ना सतायिये, जाकी मोटी हाय,

बिना जीब के स्वास से लोह भसम हो जाए ।

चलती चक्की देख के दिया कबीर रोये,

दो पाटन के बीच में बाकी बचा ना कोई ।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे ना कोई,

जो सुख में सुनिरण करे, दुःख कहे को होए ।

पत्ता टूटा डाल से ले गयी पवन उडाय,

अबके बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय ।

कबीर आप ठागायिये और ना ठगिये,

आप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुःख होए ।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।