सत री संगत के माही

पारंपरिक
माँ गंगा भजन गुरुदेव भजन ganga
॥ पावन पाठ ॥

एक घडी आधी घडी, आधी में पुनि आध,

तुलसी संगत साध की, कटे कोटि अपराध,

सत री संगत के माही, मुर्ख नही जावे रे ,

हीरो सो जन्म गंवा, फेर पछतावे रे ,

जे आवे इण माही, तो पार हो जावे रे ,

आ संता री नाव, बैठ तीर जावे रे ,

या सतसंग गंगा, ज्यो कोई नर न्हावे रे ,

मन श्रुति काया, निर्मल हो जावे रे ,

मानसरोवर सतसंग, ज्यो कोई नर आवे रे,

चुग-चुग मोती खा, हंस हरसावे रे,

नीज रा प्याला पी, अमर हो जावे रे,

नशो रहे दिन रात, काल नही खावे रे,

सहीराम गुरू पा, सतलोक दर्शावे रे,

जावे कबीरो उण धाम, फेर नही आवे रे,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।