असी उठ दे बेह्न्दे हर वेले तेरा ना ही बोले आ

पारंपरिक
अन्य भजन गुरुदेव भजन bhajan
॥ पावन पाठ ॥

ओहने की लेना ओहनू की मिलना जिहदा इक था मन टिकियाँ न

ओहने था था जाके की सिख ना जेह्डा इक दा होके सिखिया न

प्रभु वाल्मीकि तेरी किरपा सदके असी भी कदे डोले न

असी उठ दे बेह्न्दे हर वेले तेरा ना ही बोले आ

तेरा नाम तेरा नाम तेरा नाम ही बोले आ

न लेके मिलदा है सकून मेरी जिन्द्जान नु

बड़ी सोबत दे नाल लिखदा अपनी पहचान नु

असी वाल्मीकि जी दे कुल चो आ न रखने ओले आ

असी उठ दे बेह्न्दे हर वेले तेरा ना ही बोले आ

ओहना की इतहास बनाओना इतहास जो भूल गए आ

अपनी होंद गवा के गैरा दे डुल गए आ

खरे काहनू बाने बदल लये तू बदले चोले आ

असी उठ दे बेह्न्दे हर वेले तेरा ना ही बोले आ

प्रभु वाल्मीकि तेरी किरपा दा सहनु सिदक बथेरा ऐ,

जिथे सब नु तोई मिल जांदी ओह तीर्थ तेरा ऐ

प्रिंस लिख व्यान कर रेहा ओहने पाए रोले अ

असी उठ दे बेह्न्दे हर वेले तेरा ना ही बोले आ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।