चार दिनों का ताप ये कैसा फिर विपदा है लाई

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॥ पावन पाठ ॥

चोंक चोराहो पर मौत खड़ी है श्मशानो में देखो भीड़ भरी है

कोई न अपना तेरा अगन लगाये तू क्यों इतराए

चार दिनों का ताप ये कैसा फिर विपदा है लाई

अर्थी तरस रही काँधे अपने

अपने पराये सारे झूठे सपने

करले यत्न अब अपना रे भाई ये विपदा है आई

चार दिनों का ताप ये कैसा फिर विपदा है लाई

अपने भी छुटे सारे सपने भी टूटे जग के जमेंले सारे पड़ गए झूठे

करले यत्न अब दुरी बना के ये विपदा है आई

चार दिनों का ताप ये कैसा फिर विपदा है लाई

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।