समझी लेवो रे मना भाई अंत नी होय कोई आपणा

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॥ पावन पाठ ॥

समझी लेवो रे मना भाई ,

अंत नी होय कोई आपणा ।

समझी लेवो रे मना भाई ,

अंत नी होय कोई आपणा ।

आप निरंजन निरगुणा,

हारे सिरगुण तट ठाढा ,

यही रे माया के फंद में ,

नर आण लुभाणा ,

अंत नी होय कोई आपणा ।

कोट कठिन गड़ चैढ़ना,

दुर है रे पयाला ,

घड़ियाल बाजत घड़ी पहेर का ,

दुर देश को जाणा ,

अंत नी होय कोई आपणा ।

कलू काल का रयणाँ,

कोई से भेद नी कहेणा ,

झिलमील झिलमील देखणा ,

गुरु के शब्द को जपणा ,

अंत नी होय कोई आपणा ।

भवसागर का तीरणा

किस विधी पार उतरणा ,

नाव खड़ी रे केवट नही ,

अटकी रहयो रे निदाना ,

अंत नी होय कोई आपणा ।

माया के भ्रम नही भुलणा,

ठगी जासे दिवाना ,

कहे सिंगाजी पहिचाणजों

दरियाव ठिकाणाँ

अंत नी होय कोई आपणा ।

प्रेषक प्रमोद पटेल

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इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।