थारो दूध छे केवल ब्रम्ह संजोणी हरी की कामधेनु हो

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॥ पावन पाठ ॥

थारो दूध छे केवल ब्रम्ह , संजोणी हरी की कामधेनु हो

कामधेनु तो आकाश रहती , ह्रदय चारो चरती

तिरवेणी को पाणी पीती , भाई रे उनी मुनि करत गोठाण

साँझ पड़े संजोणी घर आवे , ओहम भजतों तानो

मन वाछरू उल्टो ध्यावे , भाई रे मेल्यों ते प्रेम को पानों

सतगुरु आसण धुवण बैठे , तुरिया दोहणी हाथ

अनहद के घर घुम्मर बाजे , दुह ते अखंड दिन रात

ब्रम्ह आगन पर दूध तपायो , क्षमा शांति लव लागी

अरद उरद म दही जमायो , ब्रम्ह म ब्रम्ह मिलाय

ओहम शब्द की रवि बणाई , घट अंदर लव लागी

माखन माखन संत बिलोयो , भाई रे छांछ जगत भरताय

कामधेनु सतगुरु की महिमा , बिरला जण कोई पावे

कहे जण सुंदर गुरु की किरपा , भाई रे जोत माँ जोत समाय

प्रेषक प्रमोद पटेल

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इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।