जीवन यूँ ही बीत न जाए

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॥ पावन पाठ ॥

जीवन यूँ ही बीत न जाए

जग में पशु भी खा के सोते

स्वार्थ पूर्ति में स-कुशल होते

वो मानव क्या भोग सुखों में

जीवन व्यर्थ गवाएँ जीवन

यूँ ही बीत न जाए रे जीवन

देखो सावधान अब रहना

जो कुछ दुःख आये सो सहना

धैर्य पूर्वक सह लेना ही

मन का तप कहलाए जीवन

यूँ ही बीत न जाए रे जीवन

कभी किसी को कष्ट न देकर

हितप्रद सेवा का व्रत लेकर

निज कर्तव्य निभाते रहना

पर अभिमान न आए जीवन

यूँ ही बीत न जाए रे जीवन

कभी न अपना लक्ष भुलाना

अपने को निष्काम बनाना

जो भी कामना युक्त हृदय है

प्रेम नहीं कर पाए जीवन

यूँ ही बीत न जाए रे जीवन

तन से श्रम मन से संयम हो

बुद्धि विवेकी उर उपशम हो

पथिक यही सुन्दर जीवन है

जो प्रभु के मन भाए जीवन

यूँ ही बीत न जाए रे जीवन

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।