धन्य तेरी करतार कला

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॥ पावन पाठ ॥

साहेब तमारी साहेबी,सब घट रही समाय,

जो मेहंदी के पाथ में, लाली लखी ना जाए।

लाली मेरे लाल की, जीत देखी ऊत लाल,

लाली देखन में गयी , तो में भी हो गयी लाल।

धन्य तेरी करतार कला का,

पार नहीं कोई पाता है

धन्य तेरी करतार कला का,

पार नहीं कोई पाता है

निराकार भी होकर स्वामी,

सबका तू पालन करता है,

निराकार निर्बधन स्वामी,

जनम मरण नहीं धरता है

धन्य तेरी करतार कला का,

पार नहीं कोई पाता है

तेरी सत्ता का खेल निराला,

बिरला ही मेहरम पाता है,

जिन पर कृपा भई निज तेरी,

तू वाको दरश दिखाता है

धन्य तेरी करतार कला का,

पार नहीं कोई पाता है

ऋषि मुनि और सन्त महात्मा,

निश दिन ध्यान लगाता है,

चार खान चौरासी के माहि,

तू हीं नजर एक आता है।

धन्य तेरी करतार कला का,

पार नहीं कोई पाता है

पत्ते पत्ते पर रोशनी तेरी,

बिजली सी चमक दिखाता है ,

चकित भया मन बुद्धि तेरी,

जीवादास गुण गाता है।

धन्य तेरी करतार कला का,

पार नहीं कोई पाता है

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।