जनम देने वाली इतना तू बोल रै

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॥ पावन पाठ ॥

कैसे चुकाऊ तेरी सांसो की मोल रै,

जनम देने वाली इतना तू बोल रे,

कैसे चुकाऊ तेरी सांसो की मोल रै,

जनम देने वाली इतना तू बोल रै।

ऊँगली पकड़ के चलना सिखाया मुझको,

गा-गा के लोरी तूने गोदी में खिलाया मुझको,

कैसे चुकाऊँ तेरी,

कैसे चुकाऊं तेरी ममता के बोल रे,

जनम देने वाली इतना तू बोल रै,

कैसे चुकाऊ तेरी सांसो की मोल रै,

जनम देने वाली इतना तू बोल।

रो रो के हर गम तूने हँसना सिखाया मुझको,

हर कष्ट के के तूने जीना सिखाया मुझको,

कैसे चुकाऊँ तेरी,

कैसे चुकाऊं तेरे अँसुवन के मोल रै,

कैसे चुकाऊँ तेरी साँसों की मोल रै,

जनम देने वाली इतना तू बोल रै।

आंचल की छैया देकर धुप से बचाया मुझको,

हर गम बला से तूने हर दम बचाया मुझको,

तेरे दूध का मैं कर्जा कैसे चुकाऊँगी,

कैसे चुकाऊ तेरी सांसो की मोल रै,

जनम देने वाली इतना तू बोल रै।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।