अपने ही रंग विच रंग

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॥ पावन पाठ ॥

अपने ही रंग विच रंग कांशी वालेया,

हथ जोड़ तेरे अगे अरजा करदे रही साडे अंग संग

अपने ही रंग विच रंग कांशी वालेया,

सोनेया तू सुते होए लेखा नु ज्गाउना ऐ

फरसा ते डिगिया नु अर्श बिठोना ऐ,

जीन दा सिखा दे मेनू ढंग कांशी वालेया

अपने ही रंग विच रंग कांशी वालेया,

चाड ऐसा रंग सारी जिन्गदी जो लवे न

दुनिया दे रंगा विच रंग फीका पवे न

जिह्दा जिह्दा मीरा नाल संग कांशी वालेया

अपने ही रंग विच रंग कांशी वालेया,

करदे मेहर रवा गुण तेरा गाउंदा जी

रेह्पे वाला रोशन ता तेनु ही ध्याओंदा जी

उचे तेरे नाम दी तरंग कांची वालेया

अपने ही रंग विच रंग कांशी वालेया,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।