मैं सूती रेह गई जी गुरु जी मैं करमा दी मारी

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

मैं सूती रेह गई जी गुरु जी मैं करमा दी मारी,

कोई व्यपारी भेज देयो जिस नु नींद वेच दा सारी,

मैं सूती रेह गई जी गुरु जी मैं करमा दी मारी,

एस मरन ते बेहन न देवे नाम तुहाडा लैना न देवे

सोच सोच के हारी मैं सूती रेह गई जी गुरु जी मैं करमा दी मारी,

आथन वेले सुबह सवेरे एह अखियाँ विच रेह्न्दी मेरे वन गई वैरण भारी,

मैं सूती रेह गई जी गुरु जी मैं करमा दी मारी,

रोशन रेह्पे वाला केह्न्दा नाम जपा मैं उठदा बैह्न्दा तू नजर मेहर दी मारी

मैं सूती रेह गई जी गुरु जी मैं करमा दी मारी,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।