की बड़यायियाँ तेरियाँ मेरे सतगुरु जी ओ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

की बड़यायियाँ तेरियाँ मेरे सतगुरु जी ओ

पीरा दा महा पीर तू है

फ़क्कर अव्वल फ़क़ीर तू है

हासा वी तू मीर तू है

रूह दा असल शरीर तू है

सब बहना दा वीर तू है

शुरू वी तू आख़िर तू है

वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

रूख वी तेरे पत्ते तेरे

महल ऐ सारे ही छत्ते तेरे

रूख वी तेरे पत्ते तेरे

महल ऐ सारे ही छत्ते तेरे

फीक्के तेरे रत्ते तेरे

रंग ऐ सारे ही कत्ते तेरे

तू कन कन विच कन कन तेरा

सतत् ही सुर ने सतत् है तेरे

वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

हर तन नू वस्तर बाने दिंदा

फूल सबना दी जाने दिंदा

हर तन नू वस्तर बाने दिंदा

फूल सबना दी जाने दिंदा

हर तन नू वस्तार बाने दिंदा

फूल सबना दी जाने दिंदा

हर तन नू वस्तार बाने दिंदा

फूल सबना दी जाने दिंदा

की गवाह तेरी महम सतगुरु

हर एक चुंज नू दाने दिंदा

पक्के तेरे कच्चे तेरे

झूठे तेरे सच्चे तेरे

सानू पार लगा दो

सतगुरु अस्सी अनजाने बच्चे तेरे

वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

वाह वाह गुरु वाह वाह गुरु

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।