देखो आई बसंत मतवारी रे

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

फागुन के रंग उड़े पुरवा के संग चले,

चुनर के संग उड़े साड़ी रे,

देखो आई बसंत मतवारी रे........

सरसों के फूल खिले खेत भये न्यारे,

धरती दुलहनिया को अम्बर निहारे,

अखियन की लाज रखी फूलों ने मांग भरी,

भँवरों ने आरती उतारी रे,

देखो आई बसन्त मतवारी रे.......

अम्बवा बोरा गये रे महकी अमराई,

बागन कोयलिया ने छेड़ी शहनाई,

शीतल समीर चली गाँव नगर गली गली,

फिर से उठी वन में फुलवारी रे,

देखो आई बसन्त मतवारी रे........

कान्हा ने मधुबन में छेड़ी मुरलियाँ,

राधा की छनन छनन बाजे पायलिया,

पनघट पे गाँव चले तन मन के छाव तले,

सखियों ने भरी पिचकारी रे देखो आई बसन्त मतवारी रे....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।