ऊंचा पर्वत थी, आवो ने भैरूजी

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॥ पावन पाठ ॥

उंचा पर्वत थी आवो ने भैरूजी,

दुखड़ा म्हारा थे दादा निवारजो ।

रूमझूम रूमझूम करता थे आवो,

नावड़ी म्हारी थे पार उतारजो ।।

उंचा पर्वत थी आवो ने भैरूजी...

आओ टाबरिया ऊपर, करुणा बरसावजो,

कृपा करजो थे दादा, मत तरसावजो ।

नावड़ी डूबे हैं म्हारी, पार लगावजो,

दुखड़ा म्हारा थे दादा निवारजो ।।

उंचा पर्वत थी आवो ने भैरूजी...

आधी-व्याधि थे म्हारी, हरजो जग रा देव,

मन री मुरादों पूरी, करजो म्हारा देव ।

भुला भटका मैं, शरण मे आयो,

दुखड़ा म्हारा थे दादा निवारजो ।।

उंचा पर्वत थी आवो ने भैरूजी...

खाली झोली नैन री, भरजो भैरूजी,

भक्तों री आशा पूरी, करजो भेरूजी ।

नाकोड़ा दरबार ने, घना याद करे हैं,

दुखड़ा म्हारा थे दादा निवारजो ।।

उंचा पर्वत थी आवो ने भैरूजी...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।