जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

एक दिन मटिया में सबही के सिंगार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

नाती नाते दार, काम नहीं अइहय

गाँव के लोगवा सब खड़े रही जईहय

केवल भाई भतीजे सब कहार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

महल औ अटारी सब हिये रही जावेगो

धन औ दौलत कोउ साथ नाहीं जावेको

केवल दु गज का कपड़ा बहार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

एक दिन मटिया में सबही के सिंगार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

चार कहार मिल लइके चलय डोली

राम नाम की बोलत बोली

तोहरे जीवन की बगिया में उजार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

कहत कबीर सुनो भाई सब जन

राम नाम का कर लो सुमिरन

तोहरे जीवन में एक दिन बहार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

एक दिन मटिया में सबही के सिंगार होइ

जब पिजरा से पंक्षी फरार होइ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।