कान्हा तुम्हे मैं समज ना पाई छलियाँ हो या हरजाई

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

कान्हा तुम्हे मैं समज ना पाई छलियाँ हो या हरजाई

या हो मेरे चित चोर के माखन चोर

कान्हा तुम्हे मैं समज ना पाई छलियाँ हो या हरजाई

बन के ग्वाला गईया चराए यमुना तट पे मुरली बजाए

मटकी फोड़े माखन खाए सारी गुजारियो को सताए चले नही किसी का जोर ये माखन चोर

कान्हा तुम्हे मैं समज ना पाई छलियाँ हो या हरजाई

वैसे तो तेरा रंग है काला काला हो कर भी मतवाला

अपने आप को रोक न पाऊ मैं तो खिची ही चली आऊ कान्हा तेरी और

कान्हा तुम्हे मैं समज ना पाई छलियाँ हो या हरजाई

बस मेरा है एक ही सपना तुम को बना लू मैं अब अपना

तेरी निगाहो का ये असर है तेरी मेरी प्रीत अमर है जैसे हो चाँद चकोर ये माखन चोर

कान्हा तुम्हे मैं समज ना पाई छलियाँ हो या हरजाई

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।