थारे घट में विराजे भगवान

संत कबीर
श्री कृष्ण भजन विविध भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

थारे घट में विराजे भगवान बाहर काई जोवती फिरे

नो नहाई नौरता दसवे नहाई काती,

हरी नाम की सुध नही लेवे,

फिरे गलियों में नाती,

पीपल रे डोरा बांधती फिरे,

थारे घट मे विराजे भगवान,

बाहर काई जोवती फिरे,

जीवित मात् री सुध न लेवे मरिया गंगाजी जावे,

वो सराधा में बोले का कागलो बापू के बतलावे,

आकारा पता उड़ती फिरे

थारे घट मे विराजे भगवान,

बाहर काई जोवती फिरे.....

पत्थर की रे बनी मूर्ति वह मुख से नहीं बोले,

शामे बैठो मस्त पुजारी वह दरवाजे नहीं खोले,

चंदन का टीका काटती फिरे

थारे घट मे विराजे भगवान,

बाहर काई जोवती फिरे......

रामानंद मिला गुरु पूरा जीव भरम रा तो ले,

कहत कबीर सुनो भाई संतो पर्वत के राई तो ले,

पर्वत तेरी छाया जोवती फिरे,

थारे घट मे विराजे भगवान

बाहर काई जोवती फिरे.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।