आबू पधारू है माँ

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

आशा भरल दिप जरे के रस्ता हम निहारी,

कहिया एबे माँ दरसन दै ले,

के के शेर सवारी

अहि के आस ये जीवन भैर माँ

आहि के बाट तकै छि

आबू हेमा कोरा उठाबु

हम बेटा आहाँ के कनै छी

बाट सजेने छि। आसन लगेने छी,

आबु पधारु हे माँ,

बैसल छी भोरे स कानै छी ओरे स,

कोरा उठाबु है माँ,

बाट सजेने छी,

सबहक बिपदा आहाँ हरै छी,

हम्मर निवेदन किये नै सुनै छी,

कोन गल्ती स आहाँ रसल छी,

देखु न अम्बे हम कतेक कनै छी,

अहि के पूजलौ अहि स पूछै छी,

आहाँ छोइर जेबे हम कहाँ,

बाट सजेने छी......

महिमा आहाँ के केनै जानइये,

घुइर के आबू माँ बेटा कनइये,

ममता मई आहाँ पाथर ने बनियो,

कटते कोना दिन माँ किछु करियो,

कतेक कनाबै छी किये ने आबै छी,

निसठुर नै बनियो आहाँ,

बाट सजेने छी......

हम नै मँगे छि भरल बखारी,

चाही ने हमरा बंगला आ गाड़ी,

मोन के मंदिर में बॉस करू माँ,

भक्त क पूरन आस करू माँ,

रामेंद्र लिखै ये। प्यासा गबइये,

दरसन देखाबू हे माँ...

बाट सजेने छी आसन लगेने छी,

आबु पधारु हे माँ...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।