गुरुवर मुझको दो ये वरदान

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॥ पावन पाठ ॥

गुरुवर मुझको दो ये वरदान, रहे लब पे सदा तेरा नाम,

तेरी सेवा हो कर्म मेरा, तेरे चरणों मे हो सारे धाम ।।

रहे लब पे सदा तेरा नाम..

मुझको जब से तेरा दर मिला, मेरे वीराने में गुल खिला ।

मिट गई सारी उलझन मेरी, अब नहीं कोई तुझसे गिला ।।

ना हैं कोई गिला,

हो गई राहे मेरी आसान, रहे लब पे सदा तेरा नाम,

गुरुवर मुझको दो ये वरदान, रहे लब पे सदा तेरा नाम..

मेरी नजरो को मालिक मेरे, बस तेरा ही नजारा मिले ।

कुछ और मिले ना मिले, बस तेरा ही इशारा मिले ।।

हो इशारा मिले,

करू गुणगान मैं सुबह शाम, रहे लब पे सदा तेरा नाम,

गुरुवर मुझको दो ये वरदान, रहे लब पे सदा तेरा नाम..

जो गुजरे हवा तेरे दर से, उन हवाओं को मेरा सलाम ।

झुक गया सर मेरा उसके आगे, जिसके दिल मे बसा तेरा नाम ।।

हो बसा तेरा नाम,

अब तु ही मेरा हैं जहां, रहे लब पे सदा तेरा नाम,

गुरुवर मुझको दो ये वरदान, रहे लब पे सदा तेरा नाम,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।