वे तू अंदरो प्रबु नु टोल

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

ना हो तू डावा डोल गुरा दे दर आके

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

आजा आके वेख ले जिन्दे,

किवे अम्बरा विच उडन परिंदे,

तू वी अपने परा नु खोल

गुरा दे दर आके

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

मन अन्दर तेरे सतगुरु वसदा,

देन जवाब तेरी हर इक गल दा,

तू भी मन दे पट हूँ खोल

गुरा दे दर आके

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

जग विच तेरी न कोई हस्ती,

ढोल जवे तूफ़ान विच कश्ती,

तू भी अपनी मंजिल नु टोल

गुरा दे दर आके

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

गुरु किरपा बिन जाल न कटदा,

अखियाँ तो परदा नहियो हट दा,

तू भी सतगुरु सतगुरु बोल

गुरा दे दर आके

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

नाम गुरा दा ऐसा न्यारा खोल के बंधन दें सहारा,

जपले नाम तू एह अनमोल

गुरा दे दर आके

वे तू अंदरो प्रबु नु टोल अखियाँ बंद कर के

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।