मन करता हैं अब नाकोड़ा बस जाऊ मैं

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॥ पावन पाठ ॥

मन करता हैं अब नाकोड़ा बस जाऊ मैं,

पारस भैरू की सेवा में रम जाऊ मैं ।

नित उठ मेरे दादा के दर्शन पाऊ मैं,

बस जाऊ मैं, रम जाऊ मैं

मन करता हैं अब नाकोड़ा बस जाऊ मैं..

मैं रोज सवेरे उठके, नित फुल बगीचे जाऊ,

और ताज़े फुल मैं लेके, एक सुंदर हार बनाऊ ।

अपने हाथों से दादा को पहनाऊं मैं,

बस जाऊ मैं, रम जाऊ मैं

मन करता हैं अब नाकोड़ा बस जाऊ मैं..

जल, केसर चंदन लेके, दादा की पूजा रचाऊं,

और मातर सुकड़ी लेके, भैरू को भोग लगाऊ ।

अपने हाथों से पूजा रोज रचाऊं मैं,

बस जाऊ मैं, रम जाऊ मैं

मन करता हैं अब नाकोड़ा बस जाऊ मैं..

दादा की आरती गाऊं और उनके चरण दबाऊ,

कहुं अमर भक्ति भावो को, मीठे मैं भजन सुनाऊ ।

दादा को रोज रिझाने भक्ति सुनाऊ मैं,

बस जाऊ मैं, रम जाऊ मैं

मन करता हैं अब नाकोड़ा बस जाऊ मैं..

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।