साईंया वे मेरी रूह

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

साईंया वे मेरी रूह दा जानी

हाय नि मुख मोड़ गया वे

हायो नि जींद रोल गया वे

साईंया वे मेरी रूह दा जानी

साईं मेंथो रुसेया जेह्डा मेनू मनाओनदा सी

हाय ओ वे मेनू फिर मनावे

हाये ओ वे मेनू फिर हसावे

हाये वे मेरी रूह दा जानी

दे गया जींद नु बिछोड़े नाल जेह्डा रहंदा सी

नाल रवा गा तेरे पेहला जेह्डा कहंदा सी

हाये वे हूँ नाल बिठावे,

हाय वे मेनू गल नाल लावे

हाये वे मेरी रूह दा जानी

साईं मुड के तू आजा झलक विख लाइ जा

देना दर्द बिछोड़े फेरा तू पाई जा

हाये ओ मेरा दर्द मिटावे साईं भी हूँ फेरा पावे

साईंया वे मेरी रूह दा जानी

साईं मेनू फेर कदी भी तू रोली न,

मेरी भूल भखशादे साथ कदे छोड़ी न

हाये ओ नी हूँ मेल मिलावे

साईंया नी मेनू पार लगावे

साईंया वे मेरी रूह दा जानी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।