दादा प्रेम के भुखे हैं

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॥ पावन पाठ ॥

ना हीरो के हार, ना सोने के दरबार,

ना चांदी के श्रृंगार, दादा प्रेम के भुखे हैं ।

मन में सच्चा प्यार, और सीधा सा व्यवहार,

और अहम ना भटके पास, दादा प्रेम के भुखे हैं ॥

जो पुष्प ना पास तुम्हारे, वाणी को पुष्प बनालो,

पुष्पो का हार बनाकर, उनके चरणों में चढ़ा दो,

खुश होकर मेरे दादा, कर लेगा उन्हें स्वीकार ॥

ना हीरो के हार, ना सोने के दरबार,

ना चांदी के श्रृंगार, दादा प्रेम के भुखे हैं..

दादा की कृपा हो जाती, मिट्टी सोना बन जाती,

लोहा कंचन हो जाता, जो इनका आशीष पाता,

तु भजले, तु पा ले, मेरे दादा गुरु का प्यार ॥

ना हीरो के हार, ना सोने के दरबार,

ना चांदी के श्रृंगार, दादा प्रेम के भुखे हैं..

जो छल लेकर यहां आता, वो खुद ही छला रह जाता,

तेरी लीला अजब निराली, ये भक्त भी अर्ज लगाता,

मेरी गलती माफ करना, और लुटा दे अपना प्यार ॥

ना हीरो के हार, ना सोने के दरबार,

ना चांदी के श्रृंगार, दादा प्रेम के भुखे हैं..

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।