मुखड़ा क्या देखे दर्पण में

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

मुखड़ा क्या देखे दर्पण में,

तेरे दया धर्म नहीं मन में,

मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे

कागज की एक नाव बनाई छोड़ी गहरे जल में,

धर्मी कर्मी पार उतर गया पापी डूबे जल में,

मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे.....

खाच खाच कर साफा बंदे तेल लगावे जुल्फन में,

इण ताली पर घास उगेला धेन चरेली बन मे,

मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे......

आम की डाली कोयल राजी सुआ राजी बन में,

घरवाली तो घर में राजी संत राजी बन में,

मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे.....

मोटा मोटा कड़ा पहने कान बिदावे तन में,

इण काया री माटी होवेला सो सी बीच आंगन में,

मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे.......

कोडी कोडी माया जोड़ी जोड़ रखी बर्तन में,

कहत कबीर सुनो भाई साधो रहेगी मन री मन में,

मुखड़ा क्या देखे दर्पण मे.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।