हुन आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

हुन आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे॥

असी दर तेरे ते आन खलोते सादे बिगड़े कम सवार दे,

आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे......

ना गुरु ज्ञान ना ध्यान लगाया पंजा ढगा मेनू घेरा पाया॥

मेनू मण दे मनके फेरा ना दिंदे ॥,मेरे कोल खड़े लालकरदे,

हुन आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे......

मेरे मण दिया कलियाँ डाली डाली, सदहरा भरिया पकिया ना हाली,॥

तेरी भेंटा लेके खड़े सवाली,मुखो तेरा नाम विचार दे,

आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे......

रोम रोम विच करो माँ वाससा,इस ज़िन्दगी दा की पर्वासा॥,

मै स्वास स्वास गुण गवा तेरे,मेरे ऑगन मनो विसर दयो,

आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे......

जो जन्न तेरी चरणी आवे रोग सोग सकला मिट जावे॥

ब्रह्मा टिक तेरा पार ना पावे,आ बाला दे कष्ट निवार दे,

आके मेह्रावालिये मेहरा दे छीते मरदे......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।