पुराणी पड़गी चुनड़ी

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॥ पावन पाठ ॥

बीरा थारी चुनड़ली रा चटका है दिन चार,

पुराणी पड़गी चुनड़ी......

आंखों से सुजे नहीं रे सुणे ना दोनु कान,

दांत बत्तीसी गिर पड़ी है बिगड़ी चुनड़ली री शान,

बीरा थारी चुनडली रा चटका है दिन चार,

पुराणी पड़गी चुनड़ी.......

सल पड़या शरीर में रे अब तो भज भगवान,

रंग गुलाबी उड़ गयो बिगड़ी चुनड़ली री सान,

बीरा थारी चुनडली रा चटका है दिन चार,

पुराणी पड़गी चुनड़ी......

सुध बुध भुलियो शरीर को रे थोड़ो भावे धान,

डगमग डगमग नाड़ चाले अब तू भज भगवान,

बीरा थारी चुनडली रा चटका है दिन चार,

पुराणी पड़गी चुनड़ी......

खाले पिले ओर खर्च ले कर चुनड़ी रो मान,

प्रताप गिरी यू कहते हैं रखो गुरु चरणों में ध्यान,

बीरा थारी चुनडली रा चटका है दिन चार,

पुराणी पड़गी चुनड़ी..........

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।