ना माने रे ना माने रे हे माता काली

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

झटकाए लट काली काली लम्बे लम्बे कदम बड़ा ली,

खून से खप्पर को भर डाली,

ना माने रे ना माने रे हे माता काली

इक हाथ खडग लिए दूजे हाथ में है तलवार,

रकत भीज के शीश काट ली चंडी कर ली वार पे वार,

इक बूंद न गिरी जमीन पर,खून दुष्टों का पी डाली,

ना माने रे ना माने रे हे माता काली

अखो से चिंगारी छोडे मुख से माँ छोड़े ज्वाला,

क्रोध भयंकर है काली का दूर हटे आने वाला,

सुनो युद्ध की इस भूमि पर खून से छाई है लाली,

ना माने रे ना माने रे हे माता काली

शांत हुई न जब रणचंडी जब मचा हुआ था हाहा कार,

तब काली का क्रोध मिटाने आये निरंजन शिव त्रिपुरार

पाँव पड़ा जब शिव जी के उपर जीब चंडिका ने निकाली,

ना माने रे ना माने रे हे माता काली

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।