मेरे भरती भंडारे मेरी कालका

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

कब दिन हो गया कब रात हो गई

हुई माँ किरपा क्या बात हो गई,

क्या बताऊ मैं भगतो मेरे हाल का

मेरे भरती भंडारे मेरी कालका

मैं गिरता रहा मा उठाती रही फर्ज माँ होने का माँ निभाती रही

जब से आया मैं दर हाथ है उसका सिर हर मुसीबत से मुझको बचा ती रही

रस्ता बदला बुरे वक़्त की चाल का

मेरे भरती भंडारे मेरी कालका

माँगा कुछ भी नही पर माँ देती रही खाली झोली मेरी रोज भरती रही

केह न पाऊ मैं कितने एह्सान है आज तक मुझपे जो मैया करती रही

खयाल हर दम रखा अपने इस लाल का

मेरे भरती भंडारे मेरी कालका

कुछ कमी अब नही नही कोई कसर सब कुछ पा गया मैं कलिका माँ के दर

कई जन्म बिता दू चरनो में अगर कर्ज माँ का नही फिर भी सकता उतर

हर जवाब दिया माँ ने मेरे सवाल का

मेरे भरती भंडारे मेरी कालका

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।