तुध भावे ता

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

तुध भावे ता होये आनंदा,

तुध भावे ता परम आनंदा,

सब हथ तेरे किछु नाही मेरे,

तुध भावे ता सेव करंदा,

तुध भावे ता......

आदि जुगादी तेरा भरवासा,

सतगुरु सहिजे सहिज करंदा,

तुध भावे ता.......

तू सचिआर सब दा साईं

कंत दर्शन जन तेरा बंदा,

तुध भावे ता,........

ਤੁਧ ਭਾਵੇ ਤਾਂ, ਹੋਏ ਆਨੰਦਾ,

ਤੁਧ ਭਾਵੇ ਤਾਂ, ਪਰਮ ਆਨੰਦਾ ll

ਸਭ ਹੱਥ ਤੇਰੇ, ਕਿਛੁ ਨਾਹੀਂ ਮੇਰੇ l

ਤੁਧ ਭਾਵੇ ਤਾਂ, ਸੇਵ ਕਰੰਦਾ l

ਤੁਧ ਭਾਵੇ ਤਾਂ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ, ਤੇਰਾ ਭਰਵਾਸਾ l

ਸਤਿਗੁਰੂ ਸਹਿਜੇ, ਸਹਿਜ ਕਰੰਦਾ l

ਤੁਧ ਭਾਵੇ ਤਾਂ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ਤੂੰ ਸਚਿਆਰ, ਸਭ ਦਾ ਸਾਈਂ|* l

ਕੰਤ ਦਰਸ਼ਨ ਜਨ, ਤੇਰਾ ਬੰਦਾ l

ਤੁਧ ਭਾਵੇ ਤਾਂ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ਅਪਲੋਡਰ- ਅਨਿਲਰਾਮੂਰਤੀਭੋਪਾਲ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।