शिर्डी जाने वाली हवा इक पल रुक न जरा

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॥ पावन पाठ ॥

शिर्डी जाने वाली हवा इक पल रुक न जरा

हाल मेरा मेरे साईं से केहना होगा ये एहसान तेरा

शिर्डी जाने वाली हवा इक पल रुक न जरा

साईं के दर पे जाना तू मेरा हाल सुनाना तू,

बंध कर मैं ये दुनिया दारी,

जाना पाऊ है लाचारी,

मैं हु याहा साईं वाहा दर्शन का अरमान मेरा

शिर्डी जाने वाली हवा इक पल रुक न जरा

कौन है अपना कौन बैगाना

उनके सिवा कुछ और न जाना

कोई नही है जो कही होता हो मेहरबान मेरा

शिर्डी जाने वाली हवा इक पल रुक न जरा

उनके बंदे उनकी अमानत सुनते है रहते है सदा वो सलामत ,

मेरी दुआ का क्या हुआ कुंदन है परेशान तेरा

शिर्डी जाने वाली हवा इक पल रुक न जरा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।