हर वेले तेरा ना ही बोले आ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

ओहने की लेना ओहनू की मिलना

जिहदा इक था मन कदे टिकियाँ न

ओहने था था जाके की सीखना

जेह्डा इक दा होके सिखिया न

प्रभु वाल्मीकि तेरी किरपा सद के

असी कदी भी डोले न असी उठदे बेह्न्दे

हर वेले तेरा ना ही बोले आ

ना लेके मिलदा है सकूँन मेरी जींद जान नु

बड़ी सोबत दे नाल लिखदा अपनी पहचान नु

असी वाल्मीकि जी दे कुल चो आ न रखने ओले आ

असी कदी भी डोले न असी उठदे बेह्न्दे

हर वेले तेरा ना ही बोले आ

ओहना की इतहास बनाना इतहास जो भूल गए आ

अपनी होंद गवा के गेहरा ते डुल गए आ

काहनू वाने बदल ले क्यों बदले चोले आ

असी कदी भी डोले न असी उठदे बेह्न्दे

हर वेले तेरा ना ही बोले आ

प्रभु वाल्मीकि तेरी किरपा दा सहनु सिदक बथेरा ऐ

जिथे सब नु टोई मिल जांदी ओह तीर्थ तेरा एह

प्रिंस लिख व्यान कर रहा,

ओहने पाए रोले आ

असी कदी भी डोले न असी उठदे बेह्न्दे

हर वेले तेरा ना ही बोले आ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।