रब दुरो दुरो वेख रहा

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॥ पावन पाठ ॥

रब दुरो दुरो वेख रहा किदा बन्दा मेनू वेच रहा

लंगर लाउंदा टल वजाउंदा मथे भी ओह खूब कसौंदा

मेरी बनाई दुनिया नु ओह वेह्वमा दे विच डेग रिहा

रब दुरो दुरो वेख रहा किदा बन्दा मेनू वेच रहा

एह जो रंग बिरंगे वाने आपे बन गे साद सयाने,

लोका दे विच अग लगा के अपनी रोटी सेक रेहा

रब दुरो दुरो वेख रहा किदा बन्दा मेनू वेच रहा

मन्दिर मश्जिद ते गुरुद्वारे रब नु मिल्न दे ने सहारे,

रब नु कद इस विचो बन्दा झूठी दोलत ही समेट रेहां

रब दुरो दुरो वेख रहा किदा बन्दा मेनू वेच रहा

आजो सारे भ्रम भुला के सचे मन दी ज्योत जगा के,

सब ली जो अरदास करे राजे ओही बन्दा नेक रिहा

रब दुरो दुरो वेख रहा किदा बन्दा मेनू वेच रहा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।