दादी को है मेलो

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

दादी को है मेलो सजा ले तू थाल

चाल मेरे सागे तू झुंझुनू में चाल

भादों और मंगसीर में मेलो है लागे

लोग लुगाई जावे टाबरा के सागे

नाचे है सगला ही घुमर तो गाल

चाल मेरे सागे तू झुंझुनू में चाल

मेले में लागे गो दरबार भारी

मोटी सेठानी की महिमा है न्यारी

खोल के खजाना लुटावे गी माल,

चाल मेरे सागे तू झुंझुनू में चाल

जो भी म्हारी दादी ने सांचे मन से धावे

दुःख सारा कट जावे सुख सारा पावे

निर्मल कहवे या दादी करसी निहाल ,

चाल मेरे सागे तू झुंझुनू में चाल

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।