कर दो दूर प्रभु मेरे मन में अंधेरा है

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॥ पावन पाठ ॥

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

जब से तेरी लगन लगी, हुआ मन में सवेरा है,

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अंधेरा है,

हरी तुमसे बिछड़े हुए, कई युग बीत गएँ,

अब आन मिलो प्रियतम, मेरे मन में प्यार तेरा है,

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

इतना तो बता दो मुझे, मेरी मंजिल है कहाँ,

अब ले चलो मुझको, जहाँ सन्तों का डेरा है,

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

दर्शन पाये बिना, दर से हटेंगे नहीं,

अब हमने डाल लिया, तेरे दर पे डेरा है,

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

जब से तेरी लगन लगी, मेरे मन की कलिया खिली,

अब जाग उठी किस्मत, हुआ दर्शन तेरा है,

कर दों दुर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

जब से तेरी लगन लगी, हुआ मन में सवेरा है,

कर दो दूर प्रभु, मेरे मन में अँधेरा है,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।