गुरु जी बिन न कुछ भाये

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॥ पावन पाठ ॥

हम को जो भी मिला गुरु जी से मिला न है कोई गिला क्या कहे

दिल में रेहते है वो धडकनों में में भी वो रग रग में है वो क्या कहे

जुड़ा ऐसा है ये नाता गुरु जी बिन न कुछ भाये

यही हसरत है इस दिल की दया यु ही वो बरसाए

जुड़ा ऐसा है ये नाता गुरु जी बिन न कुछ भाये

हमे है नाज किस्मत पर के उन का सिर विसाया है

भटकते फिर दिखे हम को हमे जीना सखाया है

हमारा हाथ जो थामा मिली हर वो नई राहे

यही हसरत है इस दिल की दया यु ही वो बरसाए

जुड़ा ऐसा है ये नाता गुरु जी बिन न कुछ भाये

कभी ठुकरा दी थी दुनिया निगाहें फेर कर हम से

वही अब मिलने आती है के जब सब पाया है तुम से,

तुम्ही शोहरत तुम्ही दोलत,

तुम्ही ज्यादा क्या बतलाये ,

यही हसरत है इस दिल की दया यु ही वो बरसाए

जुड़ा ऐसा है ये नाता गुरु जी बिन न कुछ भाये

तुम्हारा शुकरीयाँ गुरु जी के दिल का यही है केहना,

नही कुछ और मांगे हम के बस तुम साथ में रहना

अगर तुम साथ है अपने दुखो से हम क्यों गबराए,

यही हसरत है इस दिल की दया यु ही वो बरसाए

जुड़ा ऐसा है ये नाता गुरु जी बिन न कुछ भाये

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।