चड़ा कर शिव भोले की भंग

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

आरे चल रे कवाडिया तू कावड़ उठाये के

कावड उठाइ के ठुमका लगाई के

भोले के गीत पर डी जे की बीट पर,

ऐसा मचा दे हुडधंग,

चड़ा कर शिव भोले की भंग

काँधे पे जिसके हो गंगा का पानी

शंकर के भगतो की ये है निशानी

बम भोले बम भोले का जाप करते

लाते ये कावड डाक और तूफानी

चलते चले है याहा रुके है,

वही जमा ते ऐसा रंग

चड़ा कर शिव भोले की भंग

भोले बाबा के भजन गा रहे है

अपनी ही धुन में चले जा रहे है

पावो के छालो को दे कर के चकमा

शिव के सहारे बड़े जा रहे है

ना ही ये थक ते हिमत है रखते

दिल में जगा के ये उमंग

चड़ा कर शिव भोले की भंग

शरदा से जो भी ये कावड उठाये

भोले के भगतो की गिनती में आये,

जो भाव केवल के मन में आये

गा कर वही सोनू राना सुनाये

जब ये बजेगा जो भी सुनेगा मस्ती में होगा वो मलंग

चड़ा कर शिव भोले की भंग

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।